ताकि राष्ट्र जिन्दा रहे ![11 जनवरी,2004]


सिर्फ जिंदा लोगों से नहीं चलती यह जीवित दुनिया,


सिर्फ जिंदा लोगों से नहीं चलती यह जीवित दुनिया,


खुद को मिटाना पड़ता है ताकि राष्ट्र जिंदा रहे ।


मोमबत्ती खुद जलकर,

दुनिया प्रकाशमान करती है,


धान खुद नष्ट होकर अधिक अन्न हमें देती है,


उसी तरह शरीर गलाना पड़ता है ताकि राष्ट्र जिंदा रहे |

खुदीराम जले,भगत सिंह जले, 


राजगुरु जले,सुखदेव जले,


गांधी जले, गणेश शंकर विद्यार्थी जले,


लक्ष्मीबाई मिटीं,बेगम हजरत महल मिटीं,


इसी तरह मरने-मिटने का यह सिलसिला जारी रखना पड़ता है,ताकि राष्ट्र जिंदा रहे ।


सुभाष बाबू जले, आजाद जले,


अशफ़ाकउल्ला जले,बटुकेश्वर जले,


उसी तरह व्यक्तित्व को जलाना पड़ता है,ताकि मजार जलता रहे।


खुद अपनी चिता जलानी पड़ती है,शरीर का खून भी देना पड़ता है,ताकि देश आजाद रहे!


वतन जिंदा रहे! चमन महकता रहे! राष्ट्र जिंदा रहे!


सिर्फ जिंदा लोगों से नहीं चलती यह जीवित दुनिया,

खुद को मिटाना पड़ता है ताकि राष्ट्र जिंदा रहे।


(आशुतोष कुमार)


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