काफी है कविता बनने के लिए।#12 जनवरी,2004
कविता लिखने के लिए किसी साधना अथवा तपस्या की जरूरत नहीं,
कविता लिखने के लिए किसी साधना अथवा तपस्या की जरूरत नहीं,
आपका समाज काफी है कविता का विषय बनने के लिए ।
नदी अथवा समुद्र के किनारे बैठकर समुद्री लहरों को देखने की जरूरत नहीं,
आपका समाज और राष्ट्र काफी है कविता का विषय बनने के लिए।
किसी पहाड़ पर जाकर या ऐवरेस्ट की चोटी पर बैठकर रमणियों से लिप्त होकर आकाश के तारों को गिनने अथवा निहारने की जरूरत नहीं,
आपके समाज की औरतों का दर्द काफी है कविता बनने के लिए ।
किसी जंगल में जाकर एकांत में सोचने की जरूरत नहीं,
आपके समाज के शोषित बच्चों का दर्द काफी है कविता का विषय बनने के लिए ।
घर के किसी कोने में बैठ कर अंधेरे में सोचने-विचारने व कॉपी बर्बाद करने की जरूरत नहीं,
आपके समाज की विषमता वाली सामाजिक ,आर्थिक और राजनीतिक अन्याय काफी हैं आपकी कविता का विषय बनने के लिए।
किसी स्त्री की देह का वर्णन या फिर पुरुष के सौंदर्य वर्णन की आवश्यकता नहीं,
हमारे समाज के कमजोर तबके की आह काफी हैं आपकी कविता का विषय बनने के लिए।
आपकी कविता का विषय दागदार खादी को बनाने की जरूरत नहीं,
खुद को ख़ाक करने वाले खाकी पहनने वाले जवान का ओज काफी है आपकी कविता का विषय बनने के लिए ।
हमारी सामाजिक बुराइयाँ काफी हैं हमारी कविताओं की विषय वस्तु बनने के लिए ।
यदि यह सब देखने सुनने में तुम्हारी आँखे व कान सक्षम नहीं तो अपने राष्ट्र पर गौरव करने वाले विषय काफी हैं आपकी कविता बनने के लिए।
धन्यवाद ! (आशुतोष कुमार)

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Thank You Very Much !